समंदर बोले मैं प्यासा हूँ, प्रेम की एक बूंद चाहिए।
जिस छांव में है ठंडक सी, वो एहसास चाहिए।
बोले धरती मुझे मेरा आकाश चाहिए,
सदियों से घूम रही अब अवकाश चाहिए।
बोले चंद्रमा मुझे ढक लिया जिसकी छांव ने,
उस धरती की गोद में सिमटकर सोना चाहिए।
नदी बोले मैं बहती हूँ मीलों तक निरंतर,
मुझे कुछ देर का ठहरा एक विश्राम चाहिए।
हवा बोले मैं दूषित हो चुकी धुएँ से,
मुझे फिर से शाहजहाँ का निशात चाहिए।
अधखिली कली हूँ भंवरो से परेशान हूँ,
तितलियाँ जो चुरा ले गयी वो पराग चाहिए।
हर एक के दिल में कुछ ख़्वाहिश हैं कुछ इच्छा है,
उनको पूरा होने को कुछ वक़्त चाहिए।
बहुत मैं लिख चुका कलम भी थक चुकी होगी,
अंगुलियों में क़ैद है इसको भी आज़ादी चाहिए।
No comments:
Post a Comment