तोडा सबने दिल मगर कोई समझ न पाया,
सबने खेला खेल यहाँ पे जो भी आया,
यूँ तो लगा है पास मेरे जहाँ का मेला,
फिर भी जाने क्यूँ मेरा ही दिल अकेला,
इधर उधर की तो सब मुझसे करते बात,
लेकिन समझा न कोई दिल के ज़ज्बात,
समझा सबने खुश हूँ मैं जो मुस्काया,
लेकिन मेरा दर्द किसी को नजर न आया,
काश! दुनिया में ऐसा कोई अपना होता,
मुझे जगाता रात भर खुद भी न सोता,
एक बार जो कोई अपना कह देता,
मैं पूरी शिद्दत से हाथ वो थाम लेता,
मगर पता है ज़हर मुझे यूँ ही पीना है,
उम्र तमाम मुझे अकेले ही जीना है|
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